Women’s Safety, Child Protection and Social Accountability
Introduction
जब भी किसी लड़की के साथ रेप होता है, यह उससे गलती होती है या कोई लड़का उस पर बुरी नज़र डालकर गलत करने की कोशिश करता है, तब सोसाइटी में इसे एक गलत आचरण की तरह देखा जाता है, जो कि सही है। पर जब बात आती है पूरे समाज को एक साथ लाने की, खड़ा करने की इन बुराइयों के खिलाफ, तो हम अक्सर यह सोचते हैं कि लड़की है, किसी ने उसके साथ गलत कर दिया, बात चार दीवारों तक रहनी चाहिए, सबके सामने नहीं आनी चाहिए, वरना उसकी इज्जत जाएगी, परिवार की प्रतिष्ठा जाएगी। मैं पूछता हूँ, क्या कीजिएगा खोखली प्रतिष्ठा का, जब आपका बच्चा सुरक्षित न हो?
जब बच्ची घर में है और कोई ऐसी बात चले, जब घर में परिवार वाले यह सोचते हैं कि बच्ची के साथ कुछ गलत हो रहा है, तो घर में समझाकर बच्चे को रोको, जिसकी वजह से हो रहा है, उसे समझाओ। असल बात यह है कि ऐसा हर उस घर में अक्सर होता है या हो सकता है, जहाँ बच्चियाँ रहती हैं।
जब कोई मानसिक रूप से विकृत व्यक्ति किसी बच्ची के साथ बात करने का बहाना करके, ब्रेनवॉश करके उसका फायदा उठाने की कोशिश करता है, तो वह किसी एक बच्चे के साथ नहीं कर रहा, उसकी नज़र हर एक बच्ची पर होती है, जो उसकी रडार या पहुँच में हो। जहाँ उसकी नीयत फिसलती है और जब भी मौका मिले, वह कहीं भी इस तरह का काम कर सकता है।
बच्चे मासूम होते हैं।
बच्चे लड़के हों या लड़की, बच्चे तो बच्चे होते हैं...
उन्हें अच्छी तरह शिक्षित करना, सही-गलत बताकर समाज में बहुत ही सम्मान के साथ हर तरह की आज़ादी देना, हर अच्छे आचरण को सपोर्ट करना बच्चों को—चाहे वह घर की हो, पड़ोसी की हो, समाज की हो या किसी की भी बेटी हो या बच्ची हो, जो सड़क पर है, उसकी हिफाज़त करना, उसको अच्छा माहौल देना, उसकी रक्षा करना, अच्छी मानसिकता धारण करके पूरी संजीदगी के साथ किसी भी बच्चे के साथ होने वाले या हो सकने वाले दुर्व्यवहार को रोकना, यह हमारे समाज में हर एक नागरिक का कर्तव्य है।
सामाजिक खोखली मानसिकता
आपने देखा होगा कि ऐसी मानसिकता का शिकार होते हुए लोगों के मामलों में अक्सर यह कहकर इन सब बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है कि उम्र ऐसी है! जवानी आ गई! बच्चे तो फिसलेंगे जी। और फिर बच्चों पर रोक-टोक लगाई जाती है। जब बात बड़ों तक पहुँचे, फिर बच्चे कहीं न कहीं उनके साथ गलत ही हो रहा होता है। बच्चे कितने भी मासूम हों या चालाक हों, वे एक उम्र और सीमा तक लाचार होते हैं। किसी गाँव, घर या परिवार के अभिभावकों, परिवारजनों को कोई गलत घटना हो रही है, इसके बारे में पता चले, यह गंभीर चिंता का विषय है।
बच्चों में झूठ, डर और प्रभाव
पर बात इतनी-सी नहीं है। बच्चे एक बार इन सब चीज़ों में थोड़ा-सा भी उलझ जाएँ या फँस जाएँ, तो क्लीन मासूम (Clean Slate) बच्चा इन सब बातों में आसानी से फँसकर पहली बार झूठ बोलना शुरू कर देता है। जहाँ बच्चे झूठ बोलते हैं, फिर वे धीरे-धीरे डरना शुरू कर देते हैं। अब यह Process आगे-पीछे हो सकती है। झूठ और डर, दोनों बच्चे पर हावी होते हैं। और आगे चलकर वे और झूठ बोलते हैं।
सामाजिक बदनामी का खोखला सहारा, जो स्वयं अपराध को बढ़ावा देता है
यह जो चार समाज के (हाँ जी, चार समाज, न कि समाज के चार) लोग हैं, ये वे लोग हैं जो मानते हैं कि किसी घर की बच्ची के साथ कोई क्रिमिनल, कोई अपराध करे, तो उसे—भले बच्ची की गलती न हो—पर यह कहना कि यह बात पड़ोस में पता चलेगी, तो बदनामी होगी, यह एक विकृत समाज की पहचान है।
मासूम बच्चियों को शिकार बनाने की सज़ा
अगर किसी घर की बच्ची के साथ कोई भी अपराधी (भले शुरू में कोई अपराधी दिखाई न दे) अपराध करता है, तो वह बात घर के सदस्यों के अलावा समाज में कहीं भी आए, लोग सोचते हैं कि बच्ची की बदनामी होगी। जबकि सच यह है कि समाज में इतने परिवार, इतने लोग होने के बावजूद, एक मासूम बच्चे के साथ कोई भी क्रिमिनल गलत व्यवहार करे, चाहे वह ब्रेनवॉश करने के लिए गलत इरादे से नज़दीक आने की कोशिश करना हो, गिफ्ट देकर बहलाना हो या कुछ भी समझाकर ऐसा करना हो, यह सब गलत है। ऐसे क्रिमिनल समाज के लिए एक ऐसा कैंसर हैं, जिसे कानून-व्यवस्था से भी ठीक नहीं किया जा सकता।
जब किसी बच्चे के साथ गलत होता है, तो अक्सर यह कहा जाता है कि उस बच्चे के साथ गलत हुआ। सच यह है कि गलत समाज के साथ हो रहा है।
हमारे समाज में संविधान ने हमें इज्जत से रहने और एक-दूसरे के साथ शांति और प्यार से रहकर अपने जीवन को बेहतर बनाकर, देश में एक अच्छे नागरिक की तरह रहकर जीवन जीने के सभी प्रकार के अधिकार दिए हैं, ताकि सब शांति से रहें, कोई किसी के साथ गलत चाहकर भी न कर पाए। इसी उद्देश्य से कानून बने हैं।
उसके बाद भी जब क्रिमिनल मानसिकता के लोग, जो कि हमारे आसपास के लोग होते हैं, समाज में रहते हैं, किसी मासूम बच्चे को गलत नज़र से देखकर Target और Chase करते हैं, तो यह समाज के हर बच्चे के लिए खतरे की बात है। बात सिर्फ एक बच्चे की नहीं है, जिस पर उसकी नज़र है। बात यह है कि वह अपराधी इस वक्त एक बच्ची पर नज़र रख रहा है, मतलब उसे एक मौका चाहिए—मासूम बच्चे को दोस्ती के नाम पर पास बुलाकर, अकेले में ले जाकर, मौका मिलने के बाद अपराध करने का। उस अपराधी को कभी उसी परिस्थिति में कोई दूसरी बच्ची मिले, तो वह उसे भी वैसा ही Treat (Behave) करेगा।
यह कोई गलत आचरण या गलत आदत नहीं है कि उस व्यक्ति को मारकर, समझाकर आगाह कर दिया जाए।
जब यह बीमारी मानसिक रूप से किसी क्रिमिनल के अंदर होती है, तो किसी भी तरह से उसे ठीक नहीं किया जा सकता। ऐसी क्रिमिनल मानसिकता की सिर्फ एक ही सज़ा है, या तो मौत या उम्रकैद।
बात सिर्फ यह नहीं है कि बच्चों को गलत नज़र से देखा है, गलत काम करने की कोशिश हुई है।
बच्चे पूरी तरह मासूम होते हैं। उन्हें अच्छा-बुरा नहीं कहा जा सकता है, चाहे उनकी खुद की गलती अनजाने में क्यों न हुई हो।
डरावना सच और अंजाम
जब कोई अपराधी बच्चे से दूर से उसका नंबर लेकर या किसी भी ज़रिए से, या अकेले में मिलने के बहाने, दोस्ती के बहाने गंदी बात करता है, उसे गलत आचरण सिखा रहा होता है, तो बच्चे को नहीं पता होता कि यह कितना गलत है। धीरे-धीरे जब बच्चों को झूठ के प्रभाव (Persona) में बात करने की आदत हो जाती है, तब वे एक ऐसी आदत में पड़ चुके होते हैं कि फिर वह अपराधी पूरी तरह तैयार हो जाता है अपने अंजाम को देने के लिए। बच्ची डर गई है, बातों में आ गई है। अकेले में मौका मिले, तो इसके साथ गलत करेंगे, इसे बोलेंगे कि तुम्हें प्यार कर रहे हैं, तुम पर हमारा अधिकार है और तुमको नोचेंगे।
ताकि बच्ची को लगे कि वह सही कर रहा है। जब बच्ची को यह Naturally अच्छा नहीं भी लगे, तो भी वह इस अजीब हालात को महसूस करती है और धीरे-धीरे वह इसमें Normal हो जाए, उस अपराधी की चाह होती है। फिर यह अपराधी हर वह हद पार करता है, जो समाज के लिए एक ज़हर है, एक कैंसर है।
इसका सबसे डरावना अंजाम यह होता है कि एक मासूम बच्चा, जिसकी कोई भी गलती नहीं है, वह इस तरह एक क्रिमिनल या छपरी की बातों में आकर शुरू में थोड़ी-सी पास आती है, तो आगे चलकर वह खुद डर के कारण ये सारी बातें घर में नहीं बता पाती, क्योंकि उसे लगता है कि उसने गलत ही किया है। घर में पता चलेगा, तो घर में सब डाँटेंगे। सबको पता चलेगा, तो उसकी इज्जत जाएगी, घर में मारेंगे।
इस तरह एक बच्चा झूठ बोलता है, अपने झूठ के पकड़े जाने पर Defend करता है और आगे चलकर, क्योंकि Already यह काम पहले किसी क्रिमिनल की वजह से Experience कर चुकी है, यह सब प्यार-व्यार जैसी हवस वाली Criminal Activity भविष्य में उसे फिर गलत आचरण की तरफ आसानी से जाने के लिए एक मानसिक तैयारी का Environment बनाती है, जिससे बच्चे आसानी से अजनबी लोगों से बात करते हैं। उनकी गलत आदत को जानकर भी या तो नहीं बताएँगे या खुद तक ही रखेंगे।
अपराधी समाज का खतरा है और अपराध एक सामाजिक बीमारी
बात यह है कि कोई भी क्रिमिनल कभी किसी से प्यार नहीं कर सकता है। उनका मकसद सिर्फ यह होता है कि हर एक मासूम बच्चे को अंदर से खत्म करना, गुलाम बनाना, डराना और हमेशा ब्लैकमेल करना कि तुम मेरी यह बात (चाहे वह हाथ काटना हो, गंदी तस्वीर भेजना हो, बात मनवाना हो या किसी भी प्रकार का कोई और काम करने के लिए इस तरह से मानसिक रूप से बच्चे को तैयार कर देना कि डरावने गलत काम को उस क्रिमिनल की आज्ञा समझकर... डर और दहशत में बच्चे करें) मानो।
तो बच्ची को पता है कि यह उसे अच्छा नहीं लग रहा, पर क्योंकि क्रिमिनल बच्चों को यह सिखाते हैं कि हम तुम पर चिल्लाएँगे, तुमसे गंदी फोटो माँगेंगे, कब मिलने बुलाएँगे तो मिलोगे, तुम्हारे साथ कुछ भी करेंगे... गंदी हरकत करेंगे, तो ये सारे के सारे क्रिमिनल बच्चे को अपना गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। ऐसा गुलाम, जिससे जब चाहे तब किसी भी प्रकार की दरिंदगी कर सकते हैं। बच्चा उसे अपनी किस्मत या प्यार मानकर डर और दहशत में खुद से Accept करे कि यह सही है और आगे खुद कभी किसी को बताने की हिम्मत न करे।
जब बाद में बच्चे को यह एहसास हो भी जाए कि बच्चे ने कुछ गलत किया है, वह सह नहीं पा रही है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और बच्चा इस डर में होता है कि बच्चे के साथ गलत हो गया, अब माँ-पापा, भाई, परिवार को पता चला, तो उसकी इज्जत पर बात आएगी और बच्चे भी मार खाएँगे।
कोई भी मासूम बच्चा कितना भी हो, कोई क्रिमिनल उसे ब्रेनवॉश करे, कोई छपरी, 18-20 साल का या 30 साल का या कोई भी उम्र का, कोई स्कूल, कॉलेज या समाज में छिपे हुए ये क्रिमिनल जब किसी बच्चे के साथ इस तरह करते हैं, तो यह बहुत ही भयावह परिस्थिति है।
इससे एक मासूम बच्ची का एक ऐसा Permanent मानसिक नुकसान होता है, जो उसके एक व्यक्ति के तौर पर भविष्य को... कमजोर बनाता है। उसे एक ऐसी चीज़ का Victim बनाता है, जिसमें खुद वह बच्ची ज़िम्मेदार नहीं है।
यह एक बच्ची के जीवन को उस अँधेरे में धकेलता है, जहाँ कलंकित हमारा समाज हो रहा है। तमाम तरह के लोग होने के बावजूद हमारे समाज में कोई ऐसा अपराधी जीवित कैसे हो सकता है, जो किसी बच्चे को बुरी नज़र से देखे और मौका मिलने के बाद गलत काम करे?
सवाल यह है कि इतनी हिम्मत होना भी दूर की बात है, इस तरह की मानसिकता आखिर पैदा भी कैसे हो सकती है।
सरकार को चाहिए कि वह एक ऐसा Dedicated System बनाए, जो भारत के हर एक नागरिक को शिक्षित करे, इतना Strict और कठोर कानून बनाए कि किसी भी बच्चे के साथ कोई गलत काम न हो। कोई भी अपराधी किसी बच्चे को झूठे प्रेम जाल में फँसाकर उसका चरित्र, आचरण और जीवन बर्बाद करने की साज़िश रचे या सोचे भी या Even दोस्ती के बहाने पास आने के लिए कोई कदम बढ़ाए, झूठ बोलकर या दिखावा करके, किसी भी तरह।
हर एक अपराधी जब तक पकड़ा नहीं जाता, तब तक सामान्य ही लगता है। अपराधी वह तब भी होता है, जब वह किसी की नज़र में नहीं होता।
हर एक अपराधी अपराध की शुरुआत किसी बच्चे को शुरू में पहली बार गंदी नज़र से देखने से ही करता है। और उसे फिर बर्बाद करने की विकृत मानसिकता, जिसमें वह सफल नहीं हो सकता है, वह बच्चे को इस तरह मानसिक और शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता है (बातों में फँसाकर, डराकर, गर्लफ्रेंड बनाकर बतवाना, झुकाना और गलत करना, उसे पढ़ाई की उम्र में—सेक्स जैसी घटिया चीज़ की लत लगाना, परिवार से झूठ बुलवाना, सबूतों को डिलीट करवाना, माता-पिता को जब यह सब पता चले और रोकें और डाँटें, तो उसे यह सिखाना कि माता-पिता, परिवार ही सख्ती कर रहे हैं, बच्चे के साथ गलत कर रहे हैं, जबकि वह अपराधी तो उसके साथ अच्छा कर रहा है—इस तरह का मानसिक प्रभाव बच्चे के दिमाग में Inject करना... यह सब समाज के लिए, पूरे विश्व के लिए एक अभिशाप है।) वह बच्चे को इस तरह शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुँचाने की... कोशिश करता है...
हमें लगता है कि सिर्फ एक छपरी, एक रेपिस्ट, एक क्रिमिनल और ये ऐसे सामाजिक कैंसर हैं, सब के सब, जो मिलकर समाज की सेंट्रल शक्ति स्वरूपा हमारी माँ-बहनों पर गंदी निगाह डालते हैं और समाज को अपराधी बनाते हैं।
और अंत में, भारत की कोई भी फीमेल सिटीजन हो—बच्चे या बड़े, स्कूल की बच्ची, बेबी इन्फेंट्स (Infants) या एडल्ट सिटीजन—हर एक फीमेल सिटीजन की हिफाज़त करना, उसे एक अच्छा और सुरक्षित माहौल देना, उसे उसके जीवन का हर एक पहलू अच्छे से जीने की जो नेचर की, संविधान की दी हुई आज़ादी है, उसका Respect करना, उस पर कोई Attack न हो, यह Ensure करना—यह हमारा फ़र्ज़ है। यह हमारा संवैधानिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और मानवीय कर्तव्य है।
जब कोई किसी बच्ची या महिला के साथ गलत करता है, तो इज्जत बच्चे की नहीं जाती, इज्जत समाज की जाती है। गलत बच्चे के साथ नहीं हुआ, गलत समाज के साथ हुआ। क्योंकि वह क्रिमिनल भी किसी का बेटा होगा, उसकी भी कोई बेटी होगी या वह किसी का भाई बनेगा। वह इन सब चीज़ों को Normalize करेगा, अपने बेटे को वह सब सिखाएगा, जो उसने खुद किया।
खुद पर बीतने का इंतज़ार करना — समाज की सबसे बड़ी कमी
समाज की सबसे बड़ी कमी यह है कि लोग किसी अपराध को तब तक गंभीरता से नहीं लेते, जब तक वह उनके अपने घर में न हो जाए। जब किसी दूसरे की बेटी के साथ कुछ होता है, तो लोग बहस करते हैं, सवाल उठाते हैं और कई बार मामले को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन जब यही घटना उनके अपने घर में होती है, तो वे सख़्त सज़ा की माँग करते हैं।
हमें किसी अपराध की गंभीरता समझने के लिए उसके अपने साथ होने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। किसी दूसरे के बच्चे के साथ होने वाली घटना को भी उसी संवेदनशीलता से समझना चाहिए, जिस संवेदनशीलता से हम अपने बच्चे के लिए सोचते हैं। किसी भी बच्चे के साथ होने वाला अपराध केवल उसके परिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की समस्या है।
इतिहास की विफलता और अपराध का नॉर्मलाइजेशन
महिलाओं और बच्चियों के विरुद्ध हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है। इतने लंबे समय के बाद भी यदि समाज ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त प्रभावी व्यवस्था विकसित नहीं कर पाया है, तो यह हमारे सामाजिक सोचने के तरीके और व्यवस्था की विफलता को दिखाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज ऐसी घटनाएँ समाचारों में सामान्य खबरों की तरह दिखाई देने लगी हैं। लोग खबर पढ़ते हैं, कुछ समय चर्चा करते हैं और फिर अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते हैं। लेकिन जिस परिवार के साथ यह घटना होती है, उसके लिए यह केवल एक खबर नहीं होती। उस परिवार को मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक संकट से गुजरना पड़ता है।
पुरानी रूढ़िवादी सोच ने कई बार अपराधियों को रोकने के बजाय महिलाओं पर ही प्रतिबंध लगाने और उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए अधिक जिम्मेदार ठहराने का काम किया है। समाज को अपनी सोच बदलनी होगी और अपराध को सामान्य मानकर स्वीकार करना बंद करना होगा।
हर नागरिक का खून खोलना ज़रूरी है
जब किसी बच्ची के साथ बलात्कार, ग्रूमिंग, शोषण या मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना जैसी घटना होती है, तो हर नागरिक को उसके प्रति संवेदनशील होना चाहिए। अपराध करने वाला व्यक्ति भी इसी समाज में रहता है। इसलिए यह मानकर चुप नहीं रहा जा सकता कि ऐसी घटनाओं से हमारा कोई संबंध नहीं है।
समाज केवल लोगों के एक साथ रहने से नहीं बनता, बल्कि एक-दूसरे के प्रति उनकी जिम्मेदारी से बनता है। यदि हम दूसरों के बच्चों के साथ होने वाले अपराधों पर चुप रहते हैं, तो हम उस सामाजिक जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर रहे हैं, जो एक नागरिक के रूप में हमारी होनी चाहिए।
हर नागरिक के भीतर ऐसे अपराधों के विरुद्ध आक्रोश होना चाहिए। लेकिन यह आक्रोश केवल भावनाओं या चर्चाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे जागरूकता, पीड़ितों के समर्थन, अपराध की शिकायत करने और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने में बदलना चाहिए।
सुरक्षा के नाम पर अपराधियों को सुरक्षा देना
जब किसी बच्ची के साथ ग्रूमिंग या शोषण की कोशिश होती है, तो कई बार समाज का ध्यान अपराधी को रोकने के बजाय बच्ची पर प्रतिबंध लगाने पर चला जाता है। उसे यह कहा जाता है कि ऐसा मत करो, वहाँ मत जाओ, उससे बात मत करो या अपनी गतिविधियों को सीमित रखो।
सुरक्षा के नाम पर केवल बच्ची की स्वतंत्रता सीमित करना, जबकि अपराध करने की कोशिश करने वाले व्यक्ति को रोकने के लिए पर्याप्त कदम न उठाना, समस्या का समाधान नहीं है।
बच्चों को सुरक्षित रहने के बारे में जागरूक करना आवश्यक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि अपराध की जिम्मेदारी उन्हीं पर डाल दी जाए। सुरक्षा की जिम्मेदारी परिवार, समाज, संस्थाओं और कानून-व्यवस्था की भी है।
यदि समाज केवल संभावित पीड़ित को ही रोकता है और अपराध करने वाले व्यक्ति के व्यवहार को रोकने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाता, तो इससे समस्या बनी रह सकती है। सुरक्षा का उद्देश्य बच्चों की स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना होना चाहिए जिसमें कोई भी बच्चा बिना डर के जी सके।
सरकार और जनता की सामूहिक आवाज़
सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और उसकी जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों की सुरक्षा तथा न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए। जब समाज में बच्चों और महिलाओं के विरुद्ध अपराध होते हैं, तो जनता को अपनी आवाज़ उठानी चाहिए और सरकार से जवाबदेही की माँग करनी चाहिए।
जनता की आवाज़ केवल विरोध तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे ठोस नीतिगत सुधारों और प्रभावी व्यवस्था की माँग में बदलना चाहिए।
ऐसे मामलों के लिए संवेदनशील और प्रभावी व्यवस्था, त्वरित जाँच, समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया, पीड़ितों को उचित सहायता और अपराधों की रोकथाम के लिए जागरूकता कार्यक्रम आवश्यक हैं। साथ ही, अपराध की गंभीरता और लागू कानून के अनुसार दोषियों को कठोर सज़ा मिलनी चाहिए। गंभीर मामलों में आजीवन कारावास या मृत्युदंड जैसी सज़ा का निर्धारण भी कानून और न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए।
जब सरकार और जनता दोनों इस विषय को गंभीरता से लेंगी, तभी बच्चों और महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों को रोकने के लिए प्रभावी बदलाव संभव हो सकेगा। किसी भी बच्चे की सुरक्षा केवल उसके परिवार की जिम्मेदारी नहीं है; यह पूरे समाज और शासन-व्यवस्था की सामूहिक जिम्मेदारी है।
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